गुरुवार, 11 जनवरी 2018

बेटी का जीवन

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बेटी का जीवन भी देखो कैसा अद्भुत होता है,
देख के इसको पाल के इसको जीवनदाता रोता है.
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पैदा होती है जब बेटी ख़ुशी न मन में आती है,
बाप के मुख पर छाई निराशा माँ भी मायूस हो जाती है.
विदा किये जाने तक उसके कल्पित बोझ को ढोता है,
देख के इसको पाल के इसको जीवनदाता रोता है.
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वंश के नाम पर बेटो को बेटी से बढ़कर माने,
बेटी के महत्व को ये तो बस इतना जाने,
जीवन में दान तो बस एक बेटी द्वारा होता है,
देख के इसको पाल के इसको जीवनदाता रोता है.
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शालिनी कौशिक 

शनिवार, 6 जनवरी 2018

तीन तलाक की समाप्ति---- मानव संस्कृति का एक और एतिहासिक कदम --- डा श्याम गुप्त....

                                    



          तीन तलाक की समाप्ति---- मानव संस्कृति का एक और एतिहासिक कदम ---
      यहाँ हम मानवता की बात केवल भारतीय सन्दर्भ में नहीं अपितु वैश्विक सन्दर्भ में कर रहे हैं | यह किसी धर्म देश मज़हब एवं केवल स्त्री अस्मिता का ही प्रश्न नहीं है अपितु भारतीय अस्मिता एवं समस्त मानव जाति, मानवता का प्रश्न है |
     आखिर दाम्पत्य क्या है, विवाह क्यों व उसका अर्थ क्या है ?? विशद रूप में दाम्पत्य-भाव का अर्थ है, दो विभिन्न भाव के तत्वों द्वारा अपनी अपनी अपूर्णता सहित आपस में मिलकर पूर्णता व एकात्मकता प्राप्त करके विकास की ओर कदम बढाना। यह सृष्टि का विकास-भाव है । प्रथम सृष्टि का आविर्भाव ही प्रथम दाम्पत्य-भाव होने पर हुआ ।
    शक्ति-उपनिषद का श्लोक है  स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत। सहैता वाना स। यथा स्त्रीन्पुन्मासो संपरिस्वक्तौ स। इयमेवात्मानं द्वेधा पातपत्तनः पतिश्च पत्नी चा भवताम।  ---अर्थात अकेला ब्रह्म रमण न कर सका, उसने अपने संयुक्त भाव-रूप को विभाज़ित किया और दोनों पति-पत्नी भाव को प्राप्त हुए।
        यही प्रथम दम्पत्ति स्वयम्भू आदि-शिव व अनादि माया या शक्ति रूप है जिनसे समस्त सृष्टि का आविर्भाव हुआ। मानवी भाव में प्रथम दम्पत्ति मनु व शतरूपा हुए जो ब्रह्मा द्वारा स्वयम को स्त्री-पुरुष रूप में विभाज़ित करके उत्पन्न किये गयेजिनसे समस्त सृष्टि की उत्पत्ति हुई। सृष्टि का प्रत्येक कण धनात्मक या ऋणात्मक  ऊर्ज़ा वाला है, दोनों मिलकर पूर्ण होने पर ही, तत्व एवम यौगिक व पदार्थ की उत्पत्ति तथा विकास होता है। यजुर्वेद १०/४५ में कथन है
   एतावानेन पुरुषो यजात्मा प्रतीति। 
   विप्राः प्राहुस्तथा चैतद्यो भर्ता सांस्म्रतांगना ॥“ 
      अर्थात पुरुष भी स्वयं अकेला पुरुष नहीं बनता अपितु पत्नी व संतान मिलकर ही पूर्ण
पुरुष बनता है। स्त्री के लिए भी यही सत्य है | अतः दाम्पत्य-भाव ही पुरुष को भी संपूर्ण करता है, स्त्री को भी ।
            इस प्रकार सफ़ल दाम्पत्य का प्रभाव व उपलब्धियां ही हैं जो मानव को जीवन के लक्ष्य तक ले जाती है।
       सूर्य देवीमुषसं रोचमाना मर्यो नयोषार्मध्येति पश्चात।
        यत्रा नरो देवयंतो युगानि वितन्वते प्रति भद्राय भद्रय॥
      प्रथम दीप्तिमान ऐवम तेजसविता युक्त उषादेवी के पीछे सूर्य उसी प्रकार अनुगमन करते हैं जैसे युगों से मनुष्य व देव नारी का अनुगमन करते हैं । समाज़ व परिवार में पत्नी को सम्मान दाम्पत्य सफ़लता की कुन्जी है-
ऋग्वेद के अन्तिम मन्त्र (१०-१९१-२/४) में क्या सुन्दर कथन है---
"" समानी व अकूतिःसमाना ह्रदयानि वः ।
समामस्तु वो मनो यथा वः सुसहामतिः ॥"""---
    ------तुम्हारे हृदय समान हों, मन समान हों प्रत्येक कार्य में आपसी सहमति हो |
      पुरुष की सहयोगी शक्ति-भगिनी, मित्र, पुत्री, सखी, पत्नी, माता के रूप में सत्य ही स्नेह, संवेदनाओं एवं पवित्र भावनाओं को सींचने में युक्त नारी,  पुरुष व संतति के निर्माण व विकास की एवं समाज के सृजन, अभिवर्धन व श्रेष्ठ व्यक्तित्व निर्माण की धुरी है।
      मानव समाज के विकास के एक स्थल पर, जब संतान की आवश्यकता के साथ उसकी सुरक्षा की आवश्यकता हुई एवं यौन मर्यादा न होने से आचरणों के बुरे व विपरीत व्यक्तिगत व सामाजिक परिणाम हुए तो श्वेतकेतु ने सर्वप्रथम विवाह संस्था रूपी मर्यादा स्थापित की ताकि प्राकृतिक काम संवेग की व्यक्तिगत संतुष्टि के साथ साथ स्त्री-पुरुष के आपसी सौहार्दिक सम्बन्ध एवं सामाजिक समन्वयता भी बने रहे |  
     विवाह संस्था का सतत् विकास हुआ श्वेतकेतु ऋग्वैदिककाल की विवाह संस्था को मजबूत करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता थे। श्वेतकेतु के पिता उद्दालक प्रख्यात दर्शनशास्त्री ऋषि थे। श्वेतकेतु ने नियम बनाया कि जो स्त्री पति को छोड़ दूसरे से मिलेगी उसे भ्रूणहत्या का पाप
लगेगा और जो पुरुष अपनी स्त्री को छोड़ दूसरी से सम्पर्क करेगा उस पर भी वैसा ही कठोर पाप होगा। भारत में यही परम्परा है।
         सभी जानते हैं कि विवाह दो पृथक-पृथक पृष्ठभूमि से आये हुए व्यक्तित्वों का मिलन होता है, एक गठबंधन है, अपनी अपनी जैविक एवं सामाजिक आवश्यकता पूर्ति हित एक समझौता  ...प्रेम विवाह हो या परिवार द्वारा नियत विवाह | समझौते में अपने अपने सेल्फ को अपने दोनों के सेल्फ में समन्वित, विलय करना होता है, अपना एकल सेल्फ कुछ नहीं होता, उसे भुलाकर समन्वित सेल्फ को उभारना होता है | अर्थात कोई किसी की सत्ता से छुटकारा नहीं पा सकता समन्वय करना ही एक मात्र रास्ता है |
     यद्यपि इस समन्वय के भी दुष्परिणाम होते रहे हैं जो नारी के बंधन, नारी अत्याचार व उत्प्रीणन में बदलते रहे हैं | परन्तु समय समय पर नारी पर कठोर बंधनों के विरोध से स्वर एवं सुधार के कृतित्व होते रहे हैं |
       द्वापर में श्री कृष्ण-राधा के कार्यों के कारण गोपिकाए ( ब्रज-बनिताएं) पुरुषों के अन्याय, निरर्थक अंकुश तोड़ कर बंधनों से बाहर आने लगीं, कठोर कर्म कांडी ब्राह्मणों की स्त्रियाँ भी पतियों के अनावश्यक रोक-टोक को तोड़कर श्री कृष्ण के दर्शन को बाहर जाती हैं। यह स्त्री स्वतन्त्रता, सम्मान, अधिकारों की पुनर्व्याख्या थी। वैदिक काल के पश्चात जो सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक शून्यता समाज में आई, उसी की पुनर्स्थापना करना कृष्ण -राधा का उद्देश्य था |
   विवाह विच्छेद या तलाक ----     नर-नारी आचार-द्वंद्व तो सदा से आदिम युग से ही चला आया है परन्तु इसी चाबी से ही तो मानव आचरण व व्यवहार का ताला खुलता है|  यदि कुछ युगलों में समन्वय नहीं होपाता तो हज़ारों युगल सदैव साथ-साथ जीते भी तो हैं..हंसी-खुशी ...जीवन भर साथ निभाकर | निश्चय ही यह समस्या न पुरुष सत्ता की बात है न स्त्री-सत्ता की न धर्म की न देश समाजं की अपितु मानव आचरण की बात है | यदि यह समन्वय नहीं हो सकता तो फिर दोनों का अलग हो जाना ही उचित है | विवाह मुख्य रूप से संतानप्राप्ति एवं दांपत्य संबंध के लिए किया जाता है, किंतु यदि किसी विवाह में ये प्राप्त न हों तो दांपत्य जीवन को नारकीय या विफल बनाने की अपेक्षा विवाह विच्छेद की अनुमति दी जानी चाहिए
       विवाह विच्छेद के सम्बन्ध में मानव समाज के विभिन्न भागों में बड़ा वैविध्य है। जिन समाजों में विवाह को धार्मिक संस्कार माना जाता है, उनमें प्राय: विवाह अविच्छेद्य संबंध माना जाता है यथा हिंदू एवं रोमन कैथोलिक ईसाई समाज | यद्यपि विवाह विच्छेद या तलाक के नियमों के संबंध में अत्यधिक भिन्नता होने पर भी कुछ मौलिक सिद्धांतों में समानता है। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में भी इसको इसी रूप में बनाए रखने की चेष्टा की गई है। परन्तु विशेष परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर, इस अधिनियम के अंतर्गत वैवाहिक संबंध विघटित किया जा सकता है। इस व्यवस्था का दुरुपयोग न हो, इस दृष्टि से तलाक का अधिकार अनेक प्रतिबंधों के साथ विशेष अवस्था में ही दिया जाता है।
      कुछ समाजों में (प्रायः मुस्लिम इस्लामिक ) पुरुष को विवाह विच्छेद संबंधी असीमित अधिकार देदिए गए हैं, तीन तलाक उसी का अवांछित रूप है,जिसे अधिकाँश इस्लामिक देश भी प्रतिबंधित कर चुके हैं |
      भारत जैसे बड़े लोकतंत्र व महान राष्ट्र ने नारियों के हितार्थ जो आज किया है | इसके दूरगामी प्रभाव होंगे | निश्चय ही यह कदम केवल विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में ही मानव मानव, जाति-धर्म-पंथ की समानता समन्वय के लिए नहीं अपितु समस्त विश्व में मानवता के हित समन्वय का एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा | जिस प्रकार कभी सृष्टि के आदि में महादेव शिव की पहल पर – शिव-ब्रह्मा-इंद्र –विष्णु ने वृहद् भारत की संपन्न उत्तर दक्षिण भूमि की संपन्न संस्कृतियों के समन्वय से सार्वकालीन महान वैदिक संस्कृति की नीव रखी थी और वे देवाधिदेव कहलाये | जिस प्रकार द्वापर में श्रीकृष्ण-राधा ने स्त्रियों को अपने अधिकार दिलाये एवं वर्त्तमान युग में बहुपत्नी प्रथा की समाप्ति, विधवा विवाह की पुनः स्थापना, विवाह विच्छेद संबंधी नियम लाये गए |
     
      

रविवार, 31 दिसंबर 2017

अब हज अकेले कर लियो मुस्लिम औरतों

pm modi says muslim women can go on haj without male guardian
तीन तलाक के खिलाफ लोकसभा से बिल पारित किए जाने के ठीक बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हज यात्रा को लेकर मुस्लिम महिलाओं के हक में आवाज उठाई है। पुरुष अभिभावक के बिना महिलाओं के हज यात्रा पर रोक को भेदभाव और अन्याय बताते हुए पीएम ने कहा कि उनकी सरकार ने इसे खत्म कर दिया है। पीएम ने साल के अंतिम 'मन की बात' में कहा कि मुस्लिम महिलाएं अब पुरुषों के बिना भी हज यात्रा पर जा सकती हैं।     मुस्लिम महिलाओँ को लेकर प्रधानमंत्री मोदी जी कुछ ज्यादा ही सक्रिय हैं और पहले तीन तलाक के मुद्दे पर वे मुस्लिम  महिलाओँ का साथ देते नज़र आये और अब वे महिलाओँ के अभिभावक के साथ के बिना हज पर जाने को लेकर उन्हें ललचाते नज़र आ रहे हैं लेकिन ये सब करते हुए वे मुस्लिम महिलाओँ के लिए कुरान में दिए गए निर्देशों की तरफ तनिक भी ध्यान नहीं दे रहे हैं जबकि स्वयं मुस्लिम महिलाओँ के अनुसार ''चलना तो हमें पाक कुरान के हुकुम के अनुसार ही है '' और कुरान में महिलाओँ के लिए कहा गया है -
सर्वप्रथम -
फुक़हा इस बात पर सहमत हैं कि पत्नी के लिए - बिना किसी ज़रूरत या धार्मिक कर्तव्य के - अपने पति की अनुमति के बिना बाहर निकलना हराम (निषिद्ध) है। और ऐसा करने वाली पत्नी को वे अवज्ञाकारी (नाफरमान) पत्नी समझते हैं।
‘‘अल-मौसूअतुल फिक़हिय्या’’ (19/10709) में आया है कि :
‘‘मूल सिद्धांत यह है कि महिलाओं को घर में ही रहने का आदेश दिया गया है, और बाहर निकलने से मना किया गया है ...  अतः उसके लिए बिना उसकी - अर्थात पति की - अनुमति के बाहर निकलना जायज़ नहीं है।
इब्ने हजर अल-हैतमी कहते हैं : यदि किसी महिला को पिता की ज़ियारत के लिए बाहर निकलने की ज़रूरत पड़ जाए, तो वह अपने पति की अनुमति से श्रृंगार का प्रदर्शन किए बिना बाहर निकलेगी। तथा इब्ने हजर अल-असक़लानी ने निम्न हदीस :
(''अगर तुम्हारी औरतें रात को मस्जिद जाने के लिए अनुमति मांगें तो तुम उन्हें अनुमति प्रदान कर दिया करो।’’ )
पर टिप्पणी के संदर्भ में इमाम नववी से उल्लेख किया है कि उन्हों ने कहा : इससे इस बात पर तर्क लिया गया है कि औरत अपने पति के घर से बिना उसकी अनुमति के नहीं निकलेगी, क्योंकि यहाँ अनुमति देने का आदेश पतियों से संबंधित है।’’ संक्षेप के साथ ‘‘अल-मौसूआ’’  से उद्धरण समाप्त हुआ।
दूसरा -
और इसी के समान वह लड़की भी है जो अपने वली (अभिभावक) के घर से उसकी अनुमति के बिना निकलती है। अगर उसका अभिभावक उसकी शादी करने के मामले का मालिक है, तो वह उसके सभी मामलों में उसके ऊपर निरीक्षण करने का तो और अधिक मालिक होगा। और उन्हीं में से यह भी है कि : वह उसे अपने घर से बाहर निकलने की अनुमति दे, या अनुमति न दे ; विशेषकर ज़माने की खराबी, भ्रष्टाचार और परिस्थितियों के बदलने के साथ। बल्कि वली (अभिभावक) पर - चाहे वह बाप हो या भाई - अनिवार्य है कि वह इस ज़िम्मेदारी को उठाए, और उसके पास जो अमानत (धरोहर) है उसकी रक्षा करे, ताकि वह अल्लाह तआला से इस हाल में मिले कि उसने अपनी बेटी को सभ्य बनाया हो, उसे शिक्षा दिलाई हो और उसके साथ अच्छा व्यवहार किया हो। तथा लड़की पर अनिवार्य है कि वह इस तरह की चीज़ों में, और भलाई के सभी मामले में उसका विरोध न करे, और अपने घर से अपने अभिभावक की अनुमति के बिना बाहर न निकले।
            और ऐसे में मोदी जी उन्हें हज पर अभिभावक के बिना जाने की आज़ादी दिलवा रहे हैं क्या वे नहीं जानते कि इस भारतीय समाज में औरतों की स्थिति कितनी ख़राब है ,मुस्लिम समाज तो आज तक पिछड़ेपन को अपनाये हुए है और ऐसे में उसमे महिलाओँ की स्थिति बद से बदतर हुई जा रही है और ऐसा नहीं है कि मुस्लिम महिलाओँ की इच्छाओं के खिलाफ ऐसा हो रहा है ,ये सब उनकी इच्छाओं को अनुसार ही हो रहा है और उन्होंने पाक कुरान का आदेश मानकर इन परम्पराओं को अपनाया हुआ है और जब कोई अपना सुधार खुद ही न चाहे तो उसका कोई कुछ नहीं कर सकता ,
         न केवल मुस्लिम महिला बल्कि हिन्दू महिला की स्थिति भी कुछ बेहतर नहीं है और वे भी आज अपने आदमी से मार खाना बुरा नहीं समझती हैं और यही कारण है कि आदमी औरत को अपने पिंजरे का पंछी ही मानता है ,हमारी फ़िल्में इसका जीता जागता सबूत हैं जिनमे ख़ुशी से गाया जाता है -
 ''शादी के लिए रजामंद कर ली ,
मैंने एक लड़की पसंद कर ली ,
अब ध्यान दीजिये -
''उड़ती चिड़िया पिंजरे में बंद कर ली 
मैंने एक लड़की पसंद कर ली ''
ऐसे ही -
''तेरे लिए चाँदी का बंगला बनाऊंगा 
 बंगले में सोने का ताला लगाऊंगा
ताले में हीरे की चाबी लगाऊंगा ''
       मतलब कुछ भी है यही है कि औरत आदमी के लिए बंद रखने की एक चीज़ है और औरत इस सबके बाद भी उसी मर्द की पूजा करती है उसके व्यव्हार को अपना भाग्य मानती है ,उदाहरण के लिए यशोदा बेन हैं जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने त्याग दिया और उन्होंने अपना सारा जीवन मोदी जी की भक्ति में लगा दिया मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने पर यशोदा बेन को आशा जगी भी कि शायद उनका वनवास समाप्त हो जाये किन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ लेकिन मोदी जी स्त्री स्वतंत्रता के पक्षधर हैं ये उन्होंने साबित भी किया है यशोदा बेन को छोड़कर ,न कि मुस्लिम या अन्य महिलाओँ को सामाजिक स्थिति के अनुसार बंदिनी बनाकर ,ये तो स्त्री मन है जो स्वयं बंदिशें स्वीकार करता है और उन्हें निभाता है और उसके द्वारा सब कुछ निभाने के बावजूद पुरुष मन अपने द्वारा अत्याचार की सारी हदें पार करा देता है ,
        ऐसे में ,हमें आवश्यकता होती है ऐसे मार्गदर्शक की जिसने अपने जीवन  में ऐसे उदाहरण को अपनाया हो और तभी अपने जैसा कुछ करने की प्रेरणा औरों को दी हो और प्रधानमंत्री मोदी जी के द्वारा अपने मन की बात में औरतों को अभिभावक के बिना जाने की बात कहना इसलिए संग्रहणीय है क्योंकि जब औरत को अभिभावक के बगैर छोड़ दिया जायेगा तब धार्मिक कर्तव्य निभाने के लिए उसे स्वयं ही तो जाना होगा ,कम से कम किसी ऐसे अभिभावक की तरफ तो नहीं देखना होगा जिसने उसे त्याग दिया हो और पाक कुरान के नियमों को न समझते हुए मोदी जी मुस्लिम महिलाओँ की स्थिति यशोदा बेन वाली ही करने जा रहे हैं ,
शालिनी कौशिक 
  [कौशल ]

रविवार, 17 दिसंबर 2017

गरमागरम मामला -लघुकथा

कॉलेज के स्टाफ रूम में  पुरुष सहकर्मियों के साथ यूँ तो रोज़ किसी न किसी मुद्दे पर विचार विनिमय होता रहता था पर आज निवेदिता को दो पुरुष सहकर्मियों की उसके प्रति की गयी टिप्पणी और उससे भी बढ़कर प्रयोग की गयी भाषा बहुत अभद्र लगी थी . हुआ ये था कि दिसंबर माह में पड़ रही सर्दी के कारण निवेदिता ने लॉन्ग गरम  कोट पहना हुआ था  ,इसी पर टिप्पणी करता हुआ  एक पुरुष सहकर्मी निवेदिता को लक्ष्य कर बोला- 'देखो मैडम को आज कितनी सर्दी लग रही है ,लॉन्ग गरम कोट ,नीचे पियोर वूलन के कपडे !''इस पर दूसरे पुरुष सहकर्मी ने भी उसका साथ देते हुए कहा-'' बहुत ही गरमागरम मामला है .'' ये सुनकर पहला पुरुष सहकर्मी ठहाका लगता हुआ बोला -'' अरे आप भी क्या कह रहे हो ....गरमागरम मामला .'' और उसके ये कहते ही दोनों मिलकर मुस्कुराने लगे और निवेदिता का ह्रदय पुरुष के इस आचरण पर क्षुब्ध हो उठा जो स्त्री को हर समय इस प्रकार प्रताड़ित करने से  बाज नहीं आता .निवेदिता ने सोचा कि वो इनसे पूछे कि क्या आप लोग अपनी बहन के साथ बाहरी पुरुषों को ऐसी मजाक करने की इजाज़त  दें सकेंगें ...यदि नहीं तो आप मेरे साथ ऐसी मज़ाक कैसे कर सकते हैं ?'' पर ये शब्द निवेदिता के मन में ही दबकर रह गए .
शिखा  कौशिक नूतन 

इस डर के आगे जीत नहीं




     कांधला के गांव श्यामगढ़ी में छात्रा सोनी को उसी के गांव के अमरपाल ने कथित एकतरफा प्रेम में बलकटी से मारकर मौत के घाट उतार दिया और जिस वक़्त ये घटना हुई छात्रा सोनी के साथ तकरीबन 50 छात्राएं  मौजूद थी किन्तु सिवाय सोनी की अध्यापिका के किसी ने उसे बचाने की कोशिश नहीं की और अब घटना के बाद छात्राएं स्कूल जाने से डर रही हैं .समाचारपत्र की खबर के मुताबिक घटना के चौथे दिन केवल चार छात्राएं स्कूल पहुंची .कितने कमाल की बात है कि अपनी जान की कितनी फ़िक्र होती है सभी को जो अपने सामने एक जीते जागते इंसान को मर जाने देते हैं और कातिल को उसे मारते देखते रहते हैं और आगे अगर घटना की गवाही की बात आये तो अपनी चश्मदीदी से भी मुकर जाते हैं .
        ऐसा नहीं है कि ये पहली घटना है कांधला में जो कई लोगों के सामने हुई .यहाँ अपराधी तत्व को पता है कि आम इंसान अपनी जान की कितनी फ़िक्र करता है इतनी कि उसके सामने कोई भी बड़े से बड़ी घटना हो जाये वह मुंह नहीं खोलता .16 फरवरी सन 1997 सुबह का वक्त था .कांधला के एक डाक्टर अपनी क्लिनिक पर गए जहाँ उन्होंने देखा कि उनका क्लिनिक का सामान वहां नहीं है ,पता करने पर पता चला कि उनके दुकान मालिक ने ,जिससे उनका उसे खाली करने को लेकर केस चल रहा था ये उसी का काम है और उसी ने उनका सामान नहर किनारे फेंक दिया है बस ये जानकर उन्हें गुस्सा आ गया ,जो कि स्वाभाविक भी था ,वे घर आकर अपने परिजनों को लेकर वहां फिर पहुंचे और वहां उस वक्त जबरदस्त भीड़ इकठ्ठा हो गयी जिसमे उनके दुकान मालिक व् उसके बेटों ने उन्हें पीट -पीटकर मौत के घाट उतार दिया और भीड़ में से न किसी ने उन्हें रोका और न ही इस घटना का कोई चश्मदीद गवाह मिला .
         ऐसे ही सितम्बर सन 1997  कांधला से एक व्यापारी साथ के व्यापारियों के पैसे लेकर सामान लेने के लिए दिल्ली जाता था उस दिन उसके साथ उसका पुत्र भी था ,कांधला से रेलवे स्टेशन का रास्ता ऐसा है जो अकेले में पड़ता है बस उस व्यापारी व् उसके पुत्र को लुटेरों ने घेर लिया ये नज़ारा पीछे आने वाले बहुत से व्यापारियों ने देखा क्योंकि उस दिन बाजार की छुट्टी होने के कारण और भी बहुत से व्यापारी सामान लेने जाते थे .घटना होती देख वे पीछे रुक गए क्योंकि घटना उनके साथ थोड़े ही हो रही थी लुटेरों ने पीटकर व् गोली मारकर दोनों बाप-बेटों को मार दिया और इस घटना का भी कोई चश्मदीद गवाह नहीं मिला जबकि शहर वालों को आकर घटना का पता उन्ही पीछे के डरपोक अवसरवादी व्यापारियों ने बताया .
       ऐसे ही अभी 11 दिसंबर 2017 को कांधला में स्टेट बैंक के पास एक कोचिंग सेंटर में गांव मलकपुर की एक छात्रा पढ़ने जा रही थी सारी सड़क चलती फिरती थी पूरी चहल पहल थी तभी एक लड़का जो लड़की के ही गांव का था उसे छेड़ने लगा ,लड़की ने थोड़ी देर बर्दाश्त किया पर और लोगों ने ये देखा भी और किसी ने कुछ नहीं कहा ,आख़िरकार लड़की का धैर्य जवाब दे गया और उसने चप्पल निकालकर लड़के को खूब पीटा तब दो एक लोग भी सड़क पर उसके समर्थन में आये पर पहले शायद ये सोचकर नहीं आये कि हमारी बहन बेटी थोड़े ही है जो हम बोलें.
       इसी तरह अगर लोग डरते रहे तो अपराधियों का हौसला बढ़ता ही जायेगा .ये एक निश्चित बात है कि वारदात करने वाले अपराधी बहुत कम होते हैं और चश्मदीद बहुत  ज्यादा किन्तु एक आम मानसिकता अपराधी जानता है कि तेरी दुर्दांतता के सामने कोई नहीं आएगा ,तू कुछ भी कर कोई नहीं बोलेगा इसलिए भीड़ भी उनका वारदात करने का इरादा डिगा नहीं पाती और अगर देखा जाये तो लड़के-लड़की का भेद करने वाले कितने गलत हैं अरे जो गुण लड़कों में है वही तो लड़कियों में भी है फिर काहे का अंतर .लड़के अगर अपनी जान की फ़िक्र करते हुए अपराधी को अपराध करने देते हैं तो लड़कियां भी तो यही कर रही हैं .लड़के अगर किसी की हत्या होने पर बाजार-क़स्बा सूना कर देते हैं तो लड़कियां स्कूल सूना कर रही हैं फिर कम से कम अब तो ये भेद ख़त्म हो जाना चाहिए और इसमें गढ़ीश्याम की लड़कियों के सिर पर बहादुरी का सेहरा बांधना चाहिए .
         चलिए यह तो रहा दुःख इंसानी मतलबी मिजाज व् अवसरवादिता की आदत का जिसमे इंसान यह नहीं देखता कि जो हश्र आज दूसरा झेल रहा है कल को तू भी झेल सकता है इसलिए तुझे अपना हौसला बढ़ाना चाहिए न कि अपराधी या अपराध का .अभी  हाल ही में एक डब्ड  फिल्म ''बेख़ौफ़ खाकी ''देखी उसी की प्रेरणा से मैं आप सबसे भी यही कहती हूँ कि हमारी मदद को हमेशा पुलिस नहीं आएगी हम सब जिस आपदा का सामना स्वयं कर सकते हैं उसका सामना हमें स्वयं करना चाहिए क्योंकि यदि हम अपने में हौसला रख इन विपदाओं का सामना करेंगे तो ये विपदाएं हमारे सामने पड़ने से पहले कम से कम 100 बार सोचेंगी और अगर ऐसा नहीं करेंगे तो हमेशा डरते डरते ही ज़िंदगी गुजारते रहेंगे और ये डर ऐसा डर है जिसके आगे जीत नहीं .
शालिनी कौशिक
   [कौशल] 

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

और बचा लो इज़्ज़त - बेटी तो फालतू है ना


     छेड़खानी महिलाओं विशेषकर स्कूल-कॉलेज जाने वाली छात्राओं के साथ प्रतिदिन होने वाला अपराध है जिससे परेशानी महसूस करते करते भी पहले छात्राओं द्वारा स्वयं और बाद में अपने परिजनों को बताने पर उनके द्वारा दरकिनार कर दिया जाता है किन्तु यही छेड़खानी कभी छात्रा के विरोध या छात्रा द्वारा पहले लड़के की पिटाई ,यहाँ तक की चप्पलों तक से पिटाई तक जाती है ,कभी कभी छात्रा के परिजनों द्वारा विरोध या फिर परिजनों के व् छेड़छाड़ करने वाले लड़के व् उसके समूह की मार-पिटाई तक पहुँच जाती है .कभी कभी रोज-रोज की छेड़छाड़ से तंग आ छात्रा आत्महत्या कर लेती है और कभी लड़के द्वारा छात्रा की हत्या की परिस्थिति भी सबके समक्ष यह चुनौती बन खड़ी हो जाती है कि अब हम अपनी बेटियों को कैसे पढ़ाएं ?
    अभी 10  दिसंबर 2017 को ही कांधला कस्बे में स्टेट बैंक के पास कोचिंग सेंटर में जाती छात्रा को छेड़ने पर लड़के को छात्रा से ही चप्पलों से पिटना पड़ा था किन्तु अभी कल 13  दिसंबर 2017 को कांधला के गांव गढ़ीश्याम में गांव के अमरपाल ने गांव की ही 16 वर्षीय सोनी को 50  छात्राओं के बीच से खींचकर बलकटी से मार दिया और वहशीपन इतना ज्यादा था कि वह तब तक लड़की को बलकटी से मारता रहा जब तक कि वह मर नहीं गयी ,यहाँ तक कि उसे बचाने में उसकी टीचर को भी चोट आयी उन्होंने कातिल के पैर भी पकडे पर बात नहीं बनी , वह लड़की को मारकर ही माना .   
        इन दोनों ही मामलों में लड़के बहुत पहले से छेड़छाड़ कर रहे थे और ये बात परिजनों को भी पता थी ,पर वे कथित इज़्ज़त ,जो वे अपने मन में स्वयं सोच लेते हैं कि अगर किसी को पता चल गया कि हमारी लड़की के साथ ऐसा हो रहा है तो हमारी क्या इज़्ज़त रहेगी ,की खातिर चुप रहे .छेड़खानी अपराध भी है ये जानते हुए भी रिपोर्ट नहीं की .पहले मामले में एस.पी.शामली के द्वारा स्वयं संज्ञान लेने पर लड़के का सामना कर उसकी पिटाई करने पर जब छात्रा का सम्मान किया गया तब उसके परिजनों का हौसला बढ़ा और उन्होंने रिपोर्ट दर्ज कराई किन्तु दूसरे मामले में रिपोर्ट न कराकर जो इज़्ज़त लड़की के परिजनों ने बचाई थी वह लड़की की जान पर भरी पड़ गयी और ऐसा नहीं है कि ऐसे हादसे यहीं हो रहे हों इलाहबाद के मेजा में भी 16 वर्षीय प्रेमा की भी कातिल ने गर्दन काटकर हत्या कर दी .   
    ये हादसे थमने वाले नहीं हैं अगर लोग अपनी इज़्ज़त को इतनी मामूली समझ अपराधियों को यूँ ही खुले में घूमने देंगें जबकि कानून ने इस सम्बन्ध में व्यवस्था की है ,अगर नहीं जानते हैं तो जान लें -
      भारतीय दंड संहिता की धारा 354 -क में लैंगिक उत्पीड़न अर्थात छेड़खानी के बारे में बताया गया है और इसके लिए दंड का प्रावधान किया गया है -
1-ऐसा कोई निम्नलिखित कार्य ,अर्थात -
   i -शारीरिक संपर्क और अंगक्रियाएँ करने ,जिनमे अवांछनीय और लैंगिक सम्बन्ध बनाने सम्बन्धी स्पष्ट प्रस्ताव अंतर्वलित हों ; या 
  ii -लैंगिक स्वीकृति के लिए कोई मांग या अनुरोध करने ; या 
  iii -किसी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध बलात अश्लील साहित्य दिखाने ;या 
  iv - लैंगिक आभासी टिप्पणियाँ करने ,
      वाला पुरुष लैंगिक उत्पीड़न के अपराध का दोषी होगा .
2 -ऐसा कोई पुरुष ,जो उपधारा [1 ]के खंड  [i ] या खंड [ii ] या खंड [iii ]में विनिर्दिष्ट अपराध करेगा ,वह कठोर कारावास से जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी ,या जुर्माने से ,या दोनों से दण्डित किया जायेगा .
3 -ऐसा कोई पुरुष जो उपधारा [1 ] के खंड [iv ] में विनिर्दशित अपराध करेगा ,वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से ,जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी ,या जुर्माने से ,या दोनों से दण्डित किया जायेगा .
    इस प्रकार छेड़खानी को हमारी दंड संहिता में दण्डित किया गया है जिसे आम जनता ढंग से न जानते हुए या जानते हुए भी अपनी बेइज़्ज़ती के नाम पर अपराधियों को खुले आकाश के नीचे घूमने का मौका देती है .अब भले ही अपराधी 302 आई.पी.सी.में हत्या का दोषी हो सजा भुगते पर ऐसे में अपनी बच्ची की तो झूठी इज़्ज़त के नाम पर आप बलि चढ़ा रहे हैं जबकि अगर समय से अपराध पर कार्यवाही कर अपराधी को एक या तीन साल की सजा करा दी जाये तो अपराधी पर से एकतरफा प्रेम का भूत भी उतर सकता है और अगर नहीं उतरता तो कम से कम ये पछतावा तो नहीं रहता कि हमने अपनी बच्ची को खुद मौत के मुंह में धकेल दिया .अब ये आप पर है कि आप अपने स्नेह-प्यार  के नाम पर अपनी बेटी को बचाएंगे या झूठी इज़्ज़त के नाम पर अपराधी को -सोचिये और निर्णय कीजिये .
शालिनी कौशिक 
     एडवोकेट
  [कानूनी ज्ञान ] 


बुधवार, 13 दिसंबर 2017

सैल्यूट टू शामली एस.पी.डॉ.अजयपाल शर्मा


    शामली जिला अपराधियों से भरपूर क्षेत्र ,कोई भी अधिकारी पुलिस का ज्यादा समय नहीं टिक पाता और इन्हीं अपराधियों की भरमार ने जन्म दिया ''कैराना पलायन प्रकरण '' को .जब दिनदहाड़े अपराधी वारदात को अंजाम देने लगें ,दुकान पर बैठे व्यापारी को गोली मार मौत के घाट उतारने लगें तो हाहाकार मचनी स्वाभाविक थी ,मुकीम काला ,फुरकान आदि दर्जन भर अपराधियों ने क्षेत्र में अपनी अच्छी घुसपैठ बना ली थी तभी शामली जिले में आगमन होता है एस.पी.डॉ.अजय पाल शर्मा का ,कुछ खास नहीं लगता ,रोज़ आते हैं नए अधिकारी और चले जाते हैं ,ये भी आये हैं चले जायेंगे ,पर धीरे-धीरे नज़र आता है नवागत एस.पी.का अपराध व् अपराधियों की समाप्ति का दृढ-संकल्प और आज इसी दृढ-संकल्प का परिणाम है कि क्षेत्र सुरक्षा की हवा में साँस ले रहा है ,पर फिर भी बहुत खास नहीं लगता ,नहीं लगता कि कुछ अलग अंदाज़ लिए हैं हमारे नवागत एस.पी.महोदय ,रोज़-रोज़ समाचार पत्रों में माननीय एस.पी.डॉ.अजय पाल शर्मा के सम्मान की ख़बरें छपती हैं जिससे पता चलता रहता है अपने नवागत एस.पी.का अपराध व् अपराधियों के खिलाफ युद्ध-स्तरीय अंदाज और धीरे-धीरे थोड़ी खासियत नज़र आने लगती है अपने जिले के इस अधिकारी में किन्तु लगता यही रहता है कि सब कुछ कर वही रहे हैं जो इनके विभाग के कार्य हैं .लगता यही है कि बस ये कर रहे हैं पहले वाले अधिकारी नहीं करते थे और कुछ विशेष नहीं ,किन्तु एकाएक दिमाग में घंटियां बजती हैं और मन कहता है कि नहीं ऐसा नहीं है , ये माननीय अन्यों से अलग हैं .
        अभी हाल ही में देश में 4  से 10 दिसंबर तक महिला सशक्तिकरण सप्ताह मनाया गया जिसमे शामली के पुलिस विभाग ने डॉ.अजय पाल शर्मा की देखरेख में बहुत ही बढ़-चढ़कर कार्य किया .माननीय एस.पी.साहब के निर्देशानुसार गोहरणी गांव के दलित किसान की बेटी कोमल को एक दिन की कोतवाल बनने का मौका दिया गया और इस मौके ने एक नयी दिशा दी नारी सशक्तिकरण को .एक सामान्य छात्र का कोतवाल बनना न केवल उसके लिए वरन उसकी साथी छात्राओं के मन में एक प्रेरणा उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त है ,ये एहसास पैदा करने के लिए काफी है कि तुम भी कुछ हो और कुछ बन सकती हो ,दुनिया को अपनी मुट्ठी में कर सकती हो और ये एहसास एक नारी के मन में आना उसकी समस्त दुर्बलताओं को मिटाने के लिए राम-बाण के समान है .
        एस.पी.साहब का यह प्रयास एकदम नवीन था और सराहना के काबिल भी किन्तु फिर भी उनकी नौकरी के कार्य में ही था जिसमे उन्हें नारी को सशक्तता का अहसास कराना था किन्तु कल का कार्य न हम सोच सकते थे कि एस.पी.साहब ऐसा भी कर सकते हैं और सच में वे भी नहीं सोच सकते कि उन्होंने  एक ग्रामीण इलाके की लड़की की ज़िंदगी में ही नहीं वरन समस्त पढ़ने वाली छात्राओं व् घर से बाहर जाकर काम करने वाली महिलाओं की ज़िंदगी में उन्होंने एक नवीन सूर्योदय की शुरुआत कर दी है .
     लड़कियां इस दुनिया पर बोझ हैं .उन्हें पढ़ाना तो दूर की बात है लोग जीने भी नहीं देना चाहते .इसीलिए ही बहुत सी बार लड़कियां कोख में ही क़त्ल कर दी जाती हैं ,किन्तु हर माँ-बाप ऐसे नहीं होते ,लड़की तो लड़की वे मच्छर तक का भी क़त्ल नहीं कर सकते इसीलिए मन मारकर बेटी को जीने देते हैं .फिर आज के समाज में बेपढ़ी-लिखी लड़कियों की शादी मुश्किल है इसीलिए थोड़ा बहुत पढ़ने स्कूल भी भेजना पड़ता है ताकि अच्छी जगह शादी हो सके .इसके अलावा लड़की को स्कूल भेजने का अन्य कोई मकसद इस इलाके के माँ-बाप का नहीं होता और ऐसे में अगर लड़की के साथ छेड़खानी की घटना हो जाये तो समझ लो कि उसका पूरा जीवन बर्बाद ,तब माँ-बाप उसे घर बैठा लेंगे , न घटना की रिपोर्ट करेंगे और आनन् फानन में उसकी शादी किसी ऐसी वैसी जगह कर देंगे .ज्यादातर ऐसे मामलों में लड़की की शादी उससे उम्र में बहुत बड़े ,या कम दिमाग या किसी विकलांग लड़के से कर दी जाती है और उस पर तुर्रा ये कि चलो किसी तरह बेटी की ज़िंदगी बची और अपनी इज़्ज़त फिर चाहे लड़की को ज़िंदगी भर खून के घूँट ही पीने पड़ें जबकि उसकी कोई भी गलती नहीं होती ,ऐसे ही एक मामले में कैराना से कांधला डिग्री कालेज में आने वाली लड़की ने पढाई छोड़ दी थी ,हमें तो इतनी ही जानकारी है अब पढाई उसने छोड़ी या छुड़वा दी गई नहीं पता और आगे उसकी ज़िंदगी का क्या हुआ सभी कुछ नेपथ्य में है .
      11  दिसंबर 2017  को क़स्बा कांधला में मलकपुर गांव की एक छात्रा कोचिंग सेंटर पर जा रही थी तब एक लड़के ने उसके साथ छेड़खानी की, जिसका लड़की ने मुंहतोड़ जवाब दिया और आस-पास के लोगों की मदद के बगैर उस लड़के की चप्पलों से पिटाई भी की किन्तु मामले की रिपोर्ट नहीं की ,माननीय एस.पी.साहब ने अख़बारों में छपी खबर से मामले का संज्ञान लिया और कांधला थाने पहुंचकर छात्रा को बुलवाकर उसे सम्मानित किया और इसी सम्मान ने छात्रा व् उसके परिजनों में वह आत्मविश्वास उत्पन्न किया कि छात्रा के पिता ने आरोपी के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कराई और बताया कि आरोपी हमारे गांव का ही है और यह शुरू से छात्रा को परेशान करता था . 
         आज माननीय एस.पी.डॉ.अजय पाल शर्मा के इस सराहनीय कदम से ही छात्रा का पिता आरोपी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने की हिम्मत जुटा पाया नहीं तो वह अब भी पहले की ही तरह चुप बैठा रहता और हो सकता था कि बेटी को भी बैठा लेता ,जबकि आज इसी का सुपरिणाम है कि आरोपी पुलिस की गिरफ्त में है और यह सबक है इसी तरह की घटना को अंजाम देने वाले और सोचने वालों को कि आज नहीं तो कल को तुम्हारा भी यही हाल हो सकता है .नारी को अपनी शक्ति का एहसास दिलाने वाले माननीय एस.पी.डॉ.अजय पाल शर्मा का आभार ह्रदय से आज इस क्षेत्र की समस्त नारीशक्ति व्यक्त करती है क्योंकि नारी का सम्मान बढाकर उन्होंने ऐसा पुनीत कार्य किया है जिसका इस क्षेत्र में होना बहुत बड़े मायने रखता है और इसीलिए ये नारी शक्ति गर्व से अपने ''ग्रेट माननीय एस.पी.डॉ.अजय पाल शर्मा ''को ''सेल्यूट '' करती है .
शालिनी कौशिक 
   [कौशल ]