शनिवार, 22 जुलाई 2017

कब करोगे बेटी से इंसाफ?

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   '' वकील साहब '' कुछ करो ,हम तो लुट  गए ,पैसे-पैसे को मोहताज़ हो गए ,हमारी बेटी को मारकर वो तो बरी हो गए और हम .....तारीख दर तारीख अदालत के सामने गुहार लगाने के बावजूद कुछ नहीं कर पाए ,क्या वकील साहब अब कहीं इंसाफ नहीं है ? " रोते रोते उसने मेरे सामने अपनी बहन की दहेज़ हत्या में अदालत के निर्णय पर नाखुशी ज़ाहिर करते हुए फूट-फूटकर रोना आरम्भ कर दिया ,मैंने मामले के एक-एक बिंदु के बारे में उससे समझा-बुझाकर जानने की कोशिश की. किसी तरह उसने अपनी बहन की शादी से लेकर दहेज़-हत्या तक व् फिर अदालत में चली सारी कार्यवाही के बारे में बताया ,वो बहन के पति व् ससुर को ,पुलिस वालों को ,अपने वकील को ,निर्णय देने वाले न्यायाधीश को कुछ न कुछ कहे जा रहा था और रोये जा रहा था और मुझे गुस्सा आये जा रहा था उसकी बेबसी पर ,जो उसने खुद ओढ़ रखी थी .
             जो भी उसने बताया ,उसके अनुसार ,उसकी बहन को उसके पति व् ससुर ने कई बार प्रताड़ित कर घर से निकाल दिया था और तब ये उसे उसकी विनती पर घर ले आये थे ,फिर बार-बार पंचायतें कर उसे वापस ससुराल भेजा जाता रहा और उसका परिणाम यह रहा कि एक दिन वही हो गया जिसका सामना आज तक बहुत सी बेटियों-बहनो को करना पड़ा है और करना पड़ रहा है .
             ''दहेज़ हत्या'' कोई एक दिन में ही नहीं हो जाती उससे पहले कई दिनों,हफ्तों,महीनो तो कभी सालों की प्रताड़ना लड़की को झेलनी पड़ती है और बार बार लड़के वालों की मांगों का कटोरा उसके हाथों में दे ससुराल वालों द्वारा उसे मायके के द्वार पर टरका दिया जाता है जैसे वह कोई भिखारन हो और मायके वालों द्वारा, जिनकी गोद में वो खेल-कूदकर बड़ी हुई है ,जिनसे यदि अपना पालन-पोषण कराया है तो उनकी अपनी हिम्मत से बढ़कर सेवा-सुश्रुषा भी की है,भी कोई प्यार-स्नेह का व्यव्हार उसके साथ नहीं किया जाता ,समाज के विवाह की अनिवार्यता के नियम का पालन करते हुए जैसे-तैसे बेटी का ब्याह कर उसके अधिकांश मायके वाले उसके विवाह पर उसकी समस्त ज़िम्मेदारियों से मुक्ति मान लेते हैं और ऐसे में अगर उसके ससुराल वाले ,जो कि उन मायके वालों ने ही चुने हैं न कि उनकी बेटी ने ,अपनी कोई अनाप-शनाप ''डिमांड'' रख उनकी बेटी को ही उनके घर भेज देते हैं तो वह उनके लिए एक आपदा सामान हो जाती है और फिर वे उससे मुक्ति का नया हथियार उठाते हैं और ससुराल वालों की मांग कभी थोड़ी तो कभी पूरी मान ''कुत्ते के मुंह में खून लगाने के समान ''अपनी बेटी को फिर बलि का बकरा बनाकर वहीँ धकिया देते हैं .
               वैसे जैसे जैसे हमारा समाज विकास कर रहा है कुछ परिवर्तन तो आया है किन्तु इसका बेटी को फायदा अभी नज़र नहीं आ रहा है क्योंकि मायके वालों में थोड़ी हिम्मत तो अब आयी है .उन्होंने अब बेटी पर ससुराल में हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज़ उठानी तो अब शुरू की है जबकि पहले बेटी को उसकी ससुराल में परेशान होते हुए जानकर भी वे इसे बेटी की और घर की बदनामी के रूप में ही लेते थे और चुपचाप होंठ सीकर बेटी को ससुरालियों की प्रताड़ना सहने को मजबूर करते थे और इस तरह अनजाने में बेटी को मारने में उसके ससुरालियों का सहयोग ही करते थे ,कर तो आज भी वैसे वही रहे हैं बस आज थोड़ा बदलाव है अब लड़की वालों व् ससुरालवालों के बीच में कहीं पंचायतें हैं तो कहीं मध्यस्थ हैं और दोनों का लक्ष्य वही ....लड़की को परिस्थिति से समझौता करने को मजबूर करना और उसे उस ससुराल में मिल-जुलकर रहने को विवश करना जहाँ केवल उसका खून चूसने -निचोड़ने के लिए ही पति-सास-ससुर-ननद-देवर बैठे हैं .
               आज इसी का परिणाम है कि जो लड़की थोड़ी सी भी अपने दम पर समाज में खड़ी है वह शादी से बच रही है क्योंकि घुटने को वो,मरने को वो ,सबका करने को वो और उसको अगर कुछ हो जाये तो कोई नहीं ,न मायका उसका न ससुराल ,ससुरालियों को बहू के नाम पर केवल दौलत प्यारी और मायके वालों को बेटी के नाम पर केवल इज़्ज़त...प्यारी...ससुरालिए तो पैसे के नाम पर उसे उसके मायके धकिया देंगे और मायके वाले उसे मरने को ससुराल ,कोई उसे रखने को तैयार नहीं जबकि कहने को ''नारी हीन घर भूतों का डेरा ,यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते,रमन्ते तत्र देवता '' ऐसे पवित्र वाक्यों को सभी जानते हैं किन्तु केवल परीक्षाओं में लिखने व् भाषणों  में बोलने के लिए ,अपने जीवन में अपनाने के लिए नहीं .
                       बेटी को अगर ससुराल में कुछ हो जाये तो उसके मायके वाले दूसरों को ही कोसते हैं जो कि बहुत आसान है क्यों नहीं झांकते अपने गिरेबान में जो उनकी असलियत को उनके सामने एक पल में रख देगा .भला कोई बताये ,पति हो,सास हो ,ससुर हो,ननद-देवर-जेठ-पुलिस-वकील-जज कौन हैं ये आपकी बेटी के ? जब आप ही अपनी बेटी को आग में झोंक रहे हैं तो इन गैरों पर ऐसा करते क्या फर्क पड़ता है ? पहले खुद तो बेटी-बहन के प्रति इंसाफ करो तभी दूसरों से इंसाफ की दरकार करो .शादी करना अच्छी बात है लेकिन अगर बेटी की कोई गलती न होने पर भी ससुराल वाले उसके साथ अमानवीय बर्ताव करते हैं तो उसका मायका तो उससे दूर नहीं होना चाहिए ,कम से कम बेटी को ऐसा तो नहीं लगना चाहिए कि उसका इस दुनिया में कोई भी नहीं है .केवल दहेज़ हत्या हो जाने के बाद न्यायालय की शरण में जाना तो एक मजबूरी है ,कानून ने आज बेटी को बहुत से अधिकार दिए हैं लेकिन उनका साथ वो पूरे मन से तभी ले सकती है जब उसके अपने उसके साथ हो .अब ऐसे में एक बाप को ,एक भाई को ये तो सोचना ही पड़ेगा कि इन्साफ की ज़रुरत बेटी को कब है -मरने से पहले या मरने के बाद ?

शालिनी कौशिक 
      [कौशल]

रविवार, 9 जुलाई 2017

अमर्यादित पुरुष --डा श्याम गुप्त

------अमर्यादित पुरुष ------
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पहले महिलायें कहा करतीं थीं- ‘घर-बच्चों के मामले में टांग न अड़ाइए आप अपना काम देखिये|’
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आजकल वे कहने लगीं हैं- ‘घर के काम में भी पति को हाथ बंटाना चाहिए, बच्चे के काम में भी| क्यों? क्योंकि अब हम भी तो आदमी के तमाम कामों में हाथ बंटा रही हैं, कमाने में भी |
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क्या वास्तव में ऐसा है ? नहीं ...महिलायें आजकल पढी-लिखी होने के कारण, कुछ महिलाओं के, जो अधिकाँश असंतुष्ट व ठोकर खाई हुई होती हैं एवं कुछ छद्म-महिलावादी सेक्यूलर पुरुषों द्वारा यह सोच कि महिलायें इसी उधेड़बुन में लगी रहें ताकि कुछ ऊंचा न सोच सकें, पुरुषवादी समाज के छद्म व भ्रामक नारे को उछालने के कारण ऐसा कहने लगीं हैं|
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अन्यथा प्रायः महिलाए अपने स्वयं के और अधिक सुख-संतोष, खर्च करने, शानो-शौकत व प्रदर्शन हेतु कार्य करती हैं| वे घर के कार्य को हीन व अनावश्यक समझने के कारण एवं गृहकार्य हेतु कठिन परिश्रम से बचने हेतु भी पुरुष से यह आशा करती हैं| आजकल बाहर खाना खाने, घूमने-फिरने में समय बिताने, खर्चीले फैशन भी इस बदलाव का एक कारण है|
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परिणाम है कि पुरुष चाय बनाने, बच्चे खिलाने, घर-गृहस्थी के महिलाओं के कार्यों में सिमट रहा है | वह न आफिस का कार्य सुचारू रूप से कर पाने में सक्षम हो पारहा है न उच्च वैचारिक सोच, स्वाध्याय,पठन-पाठन हेतु समय दे पारहा है| टीवी, कम्प्युटर, इंटरनेट आदि रूपी बुद्धू बक्सा का नया रूप अब ये सारे गृहकार्य भी हो चले हैं |
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यह स्थिति पुरुष को सामाजिकता व अन्य उच्च वैचारिक क्षमता से दूर ले जारही हैं| सिर्फ भौतिकता व शारीरिक सुख का महत्व हमारे पुरुषों के, युवाओ के मन में घर बना रहा है|
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दुष्परिणाम सामने है ...समाज में स्त्री-पुरुष स्वच्छंदता, वैचारिक शून्यता, अति-भौतिकता, द्वंद्व, अत्यधिक कमाने के लिए चूहा-दौड़, बढ़ती हुई अश्लीलता ...के परिणामी तत्व---अमर्यादाशील पुरुष, संतति, जो हम प्रतिदिन समाचारों में देखते रहते हैं...यौन अपराध, नहीं कम हुआ अपराधों का ग्राफ, आदि |
\
क्यों नर एसा होगया यह भी तो तू सोच ,
क्यों है एसी होगयी उसकी गर्हित सोच |
उसकी गर्हित सोच, भटक क्यों गया दिशा से |
पुरुष सीखता राह, सखी, भगिनी, माता से |
नारी विविध लालसाओं में खुद भटकी यों |
मिलकर सोचें आज होगया एसा नर क्यों | -
--डा श्याम गुप्त
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दोष किसका है -----मीडिया का जो कि आये दिन अपने चैनल्स पर दुनिया भर की गंदगी परोसकर युवाओ के मन को उकसाता है ...

-------इस सूचना क्रांति का जिसका का दुरूपयोग होता है और युवा मन बहकता रहता है | वो सारे विज्ञापन जो टीवी में आये दिन क्या युवाओं को और उनके मन को नहीं उकसाते हैं|
-------- फिल्मो का जहां औरतो का चरित्र जिस तरह से जिन कपड़ो में दर्शाया जा रहा है, क्या वो युवा पीढ़ी को इस अपराध के लिये नहीं उकसाते होंगे|
\
हमारे गुम होते संस्कारों का जो हमें स्त्रियों का आदर करना सिखाते थे|
\
हम माता-पिता का जो कि अपने बच्चो को ठीक शिक्षा नहीं दे पा रहे है|
\ युवाओ का जो अब स्त्रियों को सिर्फ एक भोग की वस्तु ही समझ रहे है |
\
---------कहाँ गलत हो रहा है, किस बात की कुंठा है, तन का महत्व कैसे हमारे पुरुषों के, युवाओ के मन में गलत घर बना रहा है, क्या माता-पिता का दोष इन युवाओ से कम है ? क्यों उन्होंने इतनी छूट दे रखी है ? कुछ तो गलत हो रहा है, हमारी सम्पूर्ण सोच में | क्या हम सभी को; एक मज़बूत स्वच्छ व सोच की पुनर्विचार की आवश्यकता नहीं है |
...सोचियेगा अवश्य...|


शनिवार, 8 जुलाई 2017

बदलो भारतीय नारी

चली है लाठी डंडे लेकर भारतीय नारी ,
तोड़ेगी सारी बोतलें अब भारतीय नारी .
................................................
बहुत दिनों से सहते सहते बेदम हुई पड़ी थी ,
तोड़ेगी उनकी हड्डियां आज भारतीय नारी .
..........................................................
लाता नहीं है एक भी तू पैसा कमाकर ,
करता नहीं है काम घर का एक भी आकर ,
मुखिया तू होगा घर का मेरे कान खोल सुन
जब जिम्मेदारी मानेगा खुद शीश उठाकर ,
गर ऐसा करने को यहाँ तैयार नहीं है ,
मारेगी धक्के आज तेरे भारतीय नारी .
..........................................................
उठती सुबह को तुझसे पहले घर को सँवारुं,
खाना बनाके देके तेरी आरती उतारूँ,
फिर लाऊँ कमाई करके सिरपे ईंट उठाकर
तब घर पे आके देख तुझे भाग्य सँवारुं .
मेरे ही नोट से पी मदिरा मुझको तू मारे,
अब मारेगी तुझको यहाँ की भारतीय नारी .
.............................................................
पिटना किसी भी नारी का ही भाग्य नहीं है ,
अब पीट भी सकती है तुझे भारतीय नारी .
...........................................................
जीवन लिखा है साथ तेरे मेरे करम ने ,
तू मौत नहीं मेरी कहे भारतीय नारी .
.........................................................
लगाया पार दुष्टों को है देवी खडग ने ,
तुझको भी तारेगी अभी ये भारतीय नारी .
...................................................
शालिनी कौशिक
(कौशल 

गुरुवार, 22 जून 2017

मेरे मन की....



मेरी पहली पुस्तक "मेरे मन की" की प्रिंटींग का काम पूरा हो चुका है | और यह पुस्तक बुक स्टोर पर आ चुकी है| आप सब ऑनलाइन गाथा के द्वारा बुक कर सकते है| मेरी पहली बुक कविताओ और कहानीओ का अनुपम संकलन है|


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शुक्रिया

मंगलवार, 20 जून 2017

दुष्कर्मी कानून पर हावी

Navodayatimes
१६ दिसंबर २०१२ ,दामिनी गैंगरेप कांड ने हिला दिया था सियासत और समाज को ,चारो तरफ चीत्कार मची थी एक युवती के साथ हुई दरिंदगी को लेकर ,आंदोलन हुए ,सरकार पलटी ,दुष्कर्म सम्बन्धी कानून में बदलाव हुए लगा अब इस देश में नारी जीवन सुरक्षित होने जा रहा है ,जिस कानून में पहले सामूहिक बलात्संग की सजा मात्र १० वर्ष या आजीवन कारावास थी वही कानून अब अपराधियों को २० वर्ष या उनके प्राकृत जीवनकाल के लिए कारावास देने जा रहा था .मगर ये केवल सोच ही थी .  ये साबित करने के लिए किसी बड़े सबूत की आवश्यकता शायद नहीं कही जाएगी कि देश में नारी जीवन एक आपदा से कम नहीं है और इसके सम्बन्ध में चाहे कोई सरकार आये या चाहे कितना ही कठोर कानून ,नारी जीवन को सुरक्षित नहीं किया जा सकता .
 अभी तीन दिन पहले ही महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने २ दया याचिकाएं ख़ारिज कर दी और दोनों ही दया याचिकाएं रेप के आरोपियों द्वारा की गयी थी उनके द्वारा जो २०-२२ साल के लड़के होने के बावजूद एक ४ साल की बच्ची तक पर दया नहीं कर सकते ,उन पर दया की भी नहीं जानी  चाहिए ,और यही सन्देश दिया हमारे महामहिम ने ,किन्तु क्या असर हुआ ,उनकी दया याचिका ख़ारिज हो गयी किन्तु उसके ठीक २ दिन बाद एक ७ वर्षीय बालिका से ऑटो चालक द्वारा फिर उसी घटना को अंजाम दे दिया गया .यूपी के ग्रेटर नॉएडा में एक युवती के साथ गैंगरेप किया गया .इन सभी का ब्यौरा दे रही हैं निम्न क्लिपिंग्स-

 राष्‍ट्रपति ने 2 मामलों में दया याचिका को किया खारिज, जानें मामला...

      वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी  25 जुलाई को अपना पद छोड़ेंगे। लेकिन  पद छोड़ेंने के  एक माह पहले राष्‍ट्रपति ने 2 मामलों में दया याचिका को खारिज कर दिया।
जानें खारिज की गई याचिकाओं के बारें में 
पहला केस 2012 का है, जिसमें चार साल की एक बच्ची का रेप और फिर उसकी हत्या कर दी गई थी। यह केस  इंदौर है। जिसमें बाबू उर्फ केतन (22), जितेंद्र उर्फ जीतू (20) और देवेंद्र उर्फ सनी (22) ने चार साल की बच्ची का अपहरण कर उसका रेप और हत्या करने का आरोप लगा था, जिसमें सभी दोषी पाए गए हैं।
 दूसरा केस पुणे का है, जिसमें कैब ड्राइवर पर अपने साथी के साथ मिलकर युवती का रेप और हत्या के मामले में दोषी हैं। जिसमें पुरुषोत्म दसरथ बोरेट और प्रदीप यशवंद कोकडे को विप्रों में काम करने वाली एक 22 वर्षिय युवती की हत्या और रेप के मामले में दोषी पाया गया है। इन मामलों में कोर्ट ने दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है।
 दोनों केस राष्ट्रपति को अप्रैल और मई में भेजे गए थे। 
     *गुरुग्राम के डूंडाहेड़ा में एक सात साल की बच्ची के साथ एक ऑटो चालक ने कथित तौर पर रेप किया। रेप के बाद बच्ची की हालत गंभीर है। पीड़िता को सफदरजंग हॉस्पिटल रेफर कर दिया गया है।
पुलिस ने सीसीटीवी की मदद से रेप के आरोपी ऑटो चालक को गिरफ्तार कर लिया। उसके खिलाफ पोक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। आज उसे कोर्ट में पेश किया जाएगा।
पीड़ित परिवार डूंडाहेड़ा में रहता है। बताया जा रहा है कि रविवार रात एक ऑटो चालक कमल सिंह बच्ची और उसके 10 साल के भाई को फुसलाकर अपने साथ ले गया। भाई को रास्ते में छोड़कर ऑटो चालक बच्ची को सुनसान जगह पर ले गया। यहां उसने बच्ची से रेप किया।
रेप के बाद आरोपी ने दोनों को उनके घर के पास छोड़ गया। बच्ची की खराब हालत देख कर परिजनों ने पुलिस को सूचना दी। इसके बाद बच्ची को सिविल हॉस्पिटल में एडमिट करवाया गया।
जिसके बाद यहां से उसे दिल्ली रेफर कर दिया गया। पुलिस ने एरिया में लगे सीसीटीवी की फुटेज खंगाली। इसमें बच्ची के भाई ने आरोपी को पहचान लिया।
जिसके बाद चालक को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस आरोपी से पूछताछ कर रही है। बच्ची की हालत गंभीर है।
  • * यूपी के ग्रेटर नोएडा में एक महिला के साथ कार में गैंगरेप की वारदात सामने आई है। खबर है कि महिला को आरोपियों ने हरियाणा के सोहना से किडनैप किया। इसके बाद गैगरेप की वारदात को अंजाम देकर ग्रेटर नोएडा के कासना इलाके में फेंक दिया।  ग्रेटर नोएडा पुलिस ने इस पूरे मामले पर केस दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी है।
    जानकारी के मुताबिक, हरियाणा के सोहना की रहने वाली 35 साल की महिला को तीन लोगों ने स्विफ्ट कार से सोमवार की शाम 8 बजे अगवा कर रातभर सड़कों पर घुमाते रहे और गैंगरेप करते रहे। इसके बाद पीड़िता को ग्रेटर नोएडा के कासना इलाके में लाकर फेंक दिया।
    मंगलवार की सुबह जब लोगों की नजर महिला पर पड़ी, तो पुलिस को फोन करके इसकी जानकारी दी और मौके पर पहुंची पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ महिला के बयान पर जीरो एफआईआर दर्ज कर लिया है। पुलिस को पूछताछ में पता चला कि पीड़िता भरतपुर राजस्थान की रहने वाली है, जो 10 दिन पहले सोहना आई थी।
    पुलिस के मुताबिक, पीड़िता की मेडिकल जांच कराई जा रही है। इसके बाद ही पीड़िता को सोहना ले जाया जाएगा, क्योंकि वारदात हरियाणा के सोहना में हुई है, इसलिए स्थानीय पुलिस से संपर्क करके उसे जांच सौंपी जाएगी। पुलिस ने बताया कि इस वारजाद के बाद से आरोपी फरार हैं, जिनकी तलाश की जा रही है। 
  •   ये घटनाएं स्पष्ट तौर पर यह सन्देश दे रही हैं कि अपराधी अब बेख़ौफ़ हैं उनपर भारतीय कानून का कोई असर अब नहीं है .उनकी साफ तौर पर यह चेतावनी हम सबको दिखाई दे रही है जो कानून के ''सेर पर खुद को सवा सेर '' मान भी रही है और साबित भी कर रही है .ये बात जब सबको दिखाई दे रही है तो कानून के नुमाइंदो को क्यों नज़र नहीं आ रही हैं .दुष्कर्म सम्बन्धी मामलों को सुनने के लिए और उनके त्वरित निबटारो द्वारा इस समस्या पर कुछ लगाम कसने की आशा की जा सकती है अगर सरकार इस ओर ध्यान दे .

  • शालिनी कौशिक 
  •   [कौशल ]




सोमवार, 19 जून 2017

आहार से उपजे विचार ही शिशु के व्यक्तित्व को बनाते हैं

आहार से उपजे  विचार ही  शिशु के व्यक्तित्व को बनाते हैं


क्या मनुष्य केवल देह है या फिर उस देह में छिपा व्यक्तित्व?
यह व्यक्तित्व क्या है और कैसे बनता है?

भारत सरकार के आयुष मन्त्रालय द्वारा हाल ही में गर्भवती महिलाओं के लिए कुछ सुझाव दिए गए हैं जिसमें कहा गया है कि गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिलाओं को माँस के सेवन एवं सेक्स से दूर रहना चाहिए।
इस विषय पर जब आधुनिक विज्ञान के डाक्टरों से उनके विचार माँगे गए तो उनका कहना था कि  गर्भावस्था में महिला अपनी उसी दिनचर्या के अनुरूप जीवन जी सकती है जिसका पालन वह गर्भावस्था से पूर्व करती आ रही थी। अगर शारीरिक रूप से वह स्वस्थ है तो गर्भावस्था उसके जीवन जीने में कोई पाबंदी या बंदिशें लेकर नहीं आती।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की सबसे बड़ी समस्या यह ही है कि वह इस मानव शरीर के केवल भौतिक स्वरूप को ही स्वीकार करता है और इसी कारण  चिकित्सा भी केवल भौतिक शरीर की ही करता है।
जबकि भारतीय चिकित्सा पद्धति ही नहीं भारतीय दर्शन में भी मानव शरीर उसके भौतिक स्वरूप से कहीं बढ़कर है।  जहाँ आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में स्वास्थ्य की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है, वह रोग के आभाव को ही स्वास्थ्य मानता है उसके अनुसार स्वस्थ व्यक्ति वह है जिसके शरीर में बीमारियों का आभाव है और शायद इसीलिए  अभी भी ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिनके उत्तर वैज्ञानिक आज तक खोज रहे हैं।
लेकिन भारतीय चिकित्सा पद्धति की अगर बात करें तो आयुर्वेद में स्वास्थ्य के विषय में कहा गया है,
समदोषा: समाग्निश्च समधातु मलक्रिय: ।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमन: स्वस्थ इत्यभिधीयते ।।
अर्थात जिस मनुष्य के शरीर में सभी दोष अग्नि धातु मल एवं  शारीरिक क्रियाएँ समान रूप से संचालित हों तथा उसकी आत्मा शरीर तथा मन प्रसन्नचित्त हों इस स्थिति को स्वास्थ्य कहते हैं और ऐसा मनुष्य स्वस्थ कहलाता है।
1948 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी स्वास्थ्य या आरोग्य की  परिभाषा देते हुए कहा है कि,
" दैहिक,मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना ही स्वास्थ्य है"
कुल मिलाकर सार यह है कि मानव शरीर केवल एक भौतिक देह नहीं है वह उससे बढ़कर बहुत कुछ है क्योंकि आत्मा और मन के अभाव में इस शरीर को शव कहा जाता है             
और जब एक स्त्री शरीर में नवजीवन का अंकुर फूटता है तो माँ और बच्चे का संबंध केवल शारीरिक नहीं होता।
आज विभिन्न अनुसंधानों के द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि हम जो भोजन करते हैं उससे हम न सिर्फ शारीरिक पोषण प्राप्त करते हैं अपितु हमारे विचारों को भी खुराक इसी भोजन से मिलती है।
जैसा आहार हम ग्रहण करते हैं वैसा ही व्यक्तित्व हमारा बनता है।
इसलिए चूँकि गर्भावस्था के दौरान शिशु माता के ही द्वारा पोषित होता है जो भोजन माँ खाएगी शिशु के व्यक्तित्व एवं विचार उसी भोजन के अनुरूप हो होंगे।
इसी संदर्भ में महाभारत का एक  महत्वपूर्ण प्रसंग का उल्लेख यहाँ उचित होगा कि किस प्रकार महाभारत में अभिमन्यु को चक्रव्यूह के भीतर जाने का रास्ता तो पता था लेकिन बाहर निकलने का नहीं क्योंकि जब अर्जुन सुभद्रा को चक्व्यूह की रचना और उसे भेदने की कला समझा रहे थे तो वे अन्त में सो गई थीं।
इसलिए माँ गर्भावस्था के दौरान कैसा आहार विहार रखती है कौन सा साहित्य पढ़ती है या फिर किस प्रकार के विचार एवं आचरण रखती है वो शिशु के ऊपर निश्चित ही प्रभाव डालते हैं।
जिस प्रकार माता पिता के रूप और गुण बालक में जीन्स के द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होते हैं उसी प्रकार गर्भावस्था में माँ का आहार विहार भी शिशु के व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
प्रकृती में भी किसी  बीज के अंकुरित होने में मिट्टी में पाए जाने वाले पोषक तत्वों एवं जलवायु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
इसलिए गर्भावस्था किसी महिला के लिए कोई पाबंदी या बंदिशें बेशक लेकर नहीं आती
हाँ लेकिन (अगर वह समझें  तो) एक अवसर और जिम्मेदारी निश्चित रूप से लेकर आती है कि अपने भीतर पोषित होने वाले जीव के व्यक्तित्व निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका और उसकी गंभीरता को समझें। क्योंकि यह जीव जब इस दुनिया में प्रवेश करेगा तो न सिर्फ उसके जीवन का अपितु उस समाज का, इस देश का भी हिस्सा बनेगा।
भरत को एक ऐसा वीर बालक बनाने में जिसके नाम से इस देश को नाम मिला उनकी माँ शकुन्तला का ही योगदान था।
शिवाजी की वीर छत्रपति शिवाजी बनाने वाली जीजाबाई ही थीं।
तो ईश्वर ने स्त्री को सृजन करने की शक्ति केवल एक शिशु के भौतिक शरीर की नहीं उसके व्यक्तित्व के सृजन की भी दी है।
आवश्यकता स्त्री को अपनी शक्ति पहचानने की है।
डॉ नीलम महेंद्र

गुरुवार, 8 जून 2017

नारी की आपराधिक भागीदारी

ईरान की संसद और खोमैनी के मकबरे पर इस्लामिक स्टेट के हमलों में 12 की मौत

ईरान की संसद और खोमैनी के मकबरे पर इस्लामिक स्टेट के हमलों में 12 की मौत

 ईरान की संसद और यहां के क्रांतिकारी संस्थापक रूहुल्लाह खोमैनी के मकबरे पर बुधवार को बंदूकधारियों और आत्मघाती हमलावरों ने सुनियोजित हमले किए, जिसमें कम से कम 12 लोगों की मौत हो गई. इस्लामिक स्टेट समूह ने हमले की जिम्मेदारी ली है.

लगातार कई घंटे तक की गई गोलीबारी में दर्जनों लोग घायल हुए हैं. आईएस ने अपनी अमाक एजेंसी के जरिये एक वीडियो जारी किया है, जिसमें हमलावर भवन के भीतर नजर आ रहे हैं. हमले के जारी रहते हुए जिम्मेदारी लेने का यह दुर्लभ मामला है. पुलिस ने बताया कि हमला शुरू होने के करीब पांच घंटे बाद अपराह्न तीन बजे के करीब तक सभी हमलावरों को मार गिराया गया. समाचार एजेंसी आईएसएनए के अनुसार तेहरान के संसद परिसर पर चार बंदूकधारियों ने राइफल और पिस्तौल से हमला किया. इस हमले में एक सुरक्षा गार्ड और एक अन्य व्यक्ति की मौत हो गई.

गृह मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक वे महिलाओं के परिधान में थे और पर्यटकों के प्रवेश द्वार से घुसे थे. करीब-करीब उसी समय शहर के दक्षिण क्षेत्र में स्थित खोमैनी के मकबरे के परिसर में तीन-चार सशस्त्र हमलावर घुस आए, उन्होंने कथित तौर पर एक माली की हत्या कर दी इस हमले में कई और लोग घायल हो गए. खोमैनी ने वर्ष 1979 में इस्लामिक आंदोलन की अगुवाई की थी. ईरान की आपात सेवाओं के अनुसार दो हमलों में कम से कम 12 लोग मारे गए और 39 घायल हुए.
स्थानीय मीडिया के अनुसार दो हमलावरों ने मकबरे के बाहर खुद को उड़ा लिया. हमलावरों में कम-से-कम एक महिला शामिल थी. एक अन्य ने संसद भवन की चौथी मंजिल पर खुद को उड़ा लिया. हमले के समय संसद का सत्र चल रहा था और फुटेज में आसपास के कार्यालय की भवनों में मुठभेड़ के बावजूद कामकाज चलते दिख रहा है.
   ऐसा कुछ भी विशेष नहीं है इस समाचार में जो आज तक न हुआ हो और आगे नहीं होगा लेकिन अगर कुछ विशेष है तो वह है हमलावरों का महिलाओं की वेशभूषा में होना और हमलावरों में एक महिला का भी शामिल होना ,महिला का भी ऐसा नहीं है कि वह पहली बार किसी ऐसी घटना में शामिल हो रही हो लेकिन आज जो स्थिति बनती जा रही है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि महिलाओं की विशेष स्थिति को नज़रअंदाज करना होगा साथ ही इस मासूम चेहरे के पीछे छिपी कुटिलता को भी पहचानना ज़रूरी होगा .
   महाराष्ट्र इस बात का गवाह है कि २०१० से लेकर २०१२ तक भारतीय राज्यों में बहुत सी महिलाएं भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत गिरफ्तार की गयी हैं .नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार ९०,८८४ महिलाएं तीन साल की अवधि में भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत गिरफ्तार की गयी हैं .आंध्र प्रदेश में ५७,४०६ महिलाएं ,४९,३३३ महिलाएं मध्य प्रदेश में ,४९,०६६ महिलाएं तमिल नाडु में और ४१,८७२ महिलाएं गुजरात में अपराधी के रूप में गिरफ्तार की गयी हैं .महिलाओं का अपराध के क्षेत्र में सक्रीय होना ही आज महिला पुलिस की संख्या में बढ़ोतरी का  कारण है .
   हमें आज भी याद है २१ मई १९९१ को रात के १० बजकर २० मिनट का वह समय जब रेडियो  पर समाचार एकदम बंद हुए और समाचारवाचक ने तमिलनाडु के पेरम्बुदूर में एक आत्मघाती हमले में हम सबके प्रिय राजीव गाँधी जी के मारे जाने की सूचना दी और इस आत्मघाती हमले में भी एक महिला '' धानु'' शामिल थी .
       मोनिका बेदी का अंडरवर्ल्ड सम्बन्ध ,ममता कुलकर्णी का ड्रग्स मामले में भगोड़ा घोषित किया जाना ,जगह जगह बैंकों से महिलाओं द्वारा पैसे छीनकर भागना सब देख रहे हैं जान रहे हैं .
    बचपन में एक गाना सुनते थे -
'' जवान हो या बुढ़िया ,
 या नन्हीं सी गुड़िया 
  कुछ भी हो औरत 
 ज़हर की है पुड़िया .''
और इस पर चिढ जाते थे किन्तु धीरे धीरे नारी का वह रूप भी देखा जो वाकई जहरीला है .दहेज़ जो हमारे समाज का कलंक है ,कोढ़ है उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदार महिला ही है ,दामाद सास ससुर को कष्ट कम ही देते होंगे किन्तु बहु सास ससुर का जीना ज़रूर दुश्वार कर देती है.
  सब देख रहे हैं आज नारी हर दिशा में हर क्षेत्र में नाम ऊँचा कर रही है फिर अपराध में ही क्यों पीछे रहे .सब कहते हैं कि '' हर कामयाब मर्द के पीछे किसी औरत का हाथ होता है '' तो सच ही कहते हैं आज हर कामयाब बदमाश का साथ देने को नारी कंधे से कन्धा मिलाकर चल रही है और यह कह रही है -
''तू जहाँ जहाँ चलेगा ,मेरा साया साथ होगा .''

शालिनी कौशिक 
   [कौशल ]